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हुसैन शेरानी

दक्षिण एशियाई उपमहाद्वीप या दुनिया भर में मुसलमानों के बीच जाति व्यवस्था का कोई सबूत नहीं है, इस्लाम समाज के बीच किसी भी प्रकार के धार्मिक विभाजन का समर्थन नहीं करता जबकि क़ुरआन मजीद, हदीस, सुन्नत और फ़िक़्ह में भी जाति व्यवस्था का कोई सबूत नहीं मिलता। यहां तक ​​कि पैगंबर-ए-इस्लाम ने मदीना में अपने अंतिम उपदेश में समाज में किसी भी विभाजन से इनकार किया और स्पष्ट रूप से कहा कि मानव समुदाय में कोई अंतर नहीं है, किसी भी अरब को किसी गैर अरब पर कोई श्रेष्ठता नहीं और न ही किसी गैर-अरब को किसी अरब पर कोई श्रेष्ठता, गोरे को काले पर और काले को गोर पर किसी भी तरह से श्रेष्ठता नहीं है। धर्मपरायणता और अच्छे कर्मों के अलावा किसी को किसी पर कोई श्रेष्ठता नहीं।लेकिन अब इस्लामी शिक्षाओं के विपरीत दक्षिण एशियाई देशों में विशेषकर भारत में जाति व्यवस्था प्रचलित हो गई है।

देश के उत्तरी भाग में भारतीय मुसलमान ‘जाति’ और ‘समुदाय’ शब्दों का प्रमुखता से उपयोग करते हैं, जिनकी तुलना अक्सर हिंदू समाज की ‘जाति’ व्यवस्था से की जाती है। भारतीय मुसलमानों में जाति व्यवस्था को उजागर करने के लिए विद्वानों और शिक्षकों द्वारा किए गए शोध से पता चलता है कि भारतीय मुसलमानों में तीन प्रकार की जातियाँ हैं: अशरफ, अज़लफ, अर्ज़ल, जो हिंदुओं की ‘वर्ण’ व्यवस्था के समान हैं। यह बताया गया है कि अशरफ मुसलमान चार प्रकार के विदेशी सय्यद, शेख, मुगल और पठान हैं जबकि अज़लफ और अर्ज़ल भारत के शिल्पकार हैं। यह वर्ग दूसरे देशों से आए (अशरफ) और स्थानीय धर्मान्तरित (अज़लफ) के बीच जातीय अलगाव के साथ-साथ स्थानीय परिवर्तनों के बीच भारतीय जाति व्यवस्था की निरंतरता के परिणामस्वरूप विकसित हुआ।भारत में मुसलमानों के बीच जाति व्यवस्था पर भारतीय साहित्य में कई शोध हुए हैं।

भारतीय मुसलमानों के बीच जाति के अस्तित्व पर चर्चा करते हुए, एक प्रसिद्ध समाजशास्त्री इम्तियाज अहमद ने अपने शोध में दावा किया कि भारत में मुसलमानों और हिंदुओं ने एक ही समाज का हिस्सा होने के कारण अपने सामाजिक संगठन की संरचनात्मक विशेषताओं को साझा किया है। इस तथ्य को स्वीकार करते हुए कि भारतीय मुसलमानों में भी हिंदुओं की तरह एक जाति व्यवस्था है हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि इस संरचना में अशरफ वर्ग का स्थान सर्वोच्च है यहां सय्यद और शेख दोनों धार्मिक विद्वानों के रूप में हिंदुओं के ब्राह्मण समुदाय के समान हैं। अंसारी समुदाय को करीब से देखने पर दक्षिण एशियाई ‘मुस्लिम जाति व्यवस्था’ की तस्वीर सामने आती है।

अजलफ वर्ग को मोटे तौर पर मज़दूरों या पेशेवर जातियों (जैसे कसाई, नाई, दर्जी, आदि) के वंशजों में वर्गीकृत किया गया है। वे भारत की कुल मुस्लिम आबादी का 85% से अधिक हिस्सा हैं। इस वर्ग को अक्सर भारतीय ‘पिछड़े मुसलमान’ के रूप में जाना जाता है। अरजल, या अछूत जातियों (विशेषकर चमार और झाड़ू चलाने वाली भंगी) को मुस्लिम जाति व्यवस्था में अल्पसंख्यक माना जाता है। एक अन्य उल्लेखनीय श्रेणी मुस्लिम राजपूत हैं जो इन वर्गों में फिट नहीं होते हैं और कई हिंदू रीति-रिवाजों और परंपराओं का पालन करते हैं, जबकि वे खुद निम्न वर्गों से संबंध नहीं रखना चाहते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि अशरफ वर्ग उनके साथ शादी ब्याह के रिश्ते नहीं करते। वर्तमान में दक्षिण एशियाई मुसलमान हिंदू जाति व्यवस्था की तरह सामाजिक गतिशीलता जैसे गतिशील परिवर्तनों का अनुभव कर रहे हैं।भारतीय मुसलमानों के बीच जाति व्यवस्था इस्लामी सिद्धांतों की आड़ में छिपी हुई है। हालांकि एक वास्तविक विश्लेषण से पता चलेगा कि भारतीय मुसलमानों के बीच जाति-आधारित विभाजन भारतीय और विदेशी जातियों पर आधारित हैं।

इस मुद्दे को हल करने के लिए बीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक के दौरान, भारतीय मुसलमानों के बीच विभिन्न जाति आंदोलन शुरू किए गए जिनमें मोमिन तहरीक और बाद में पसमान्दा तहरीक शामिल है, जबकि जाति पर आधारित आंदोलनों और प्रोग्रामों के बावजूद भारतीय मुसलमानों में ज़ात पात का निज़ाम गहरा सरायत कर चूका है जिसका परिणाम यह हुआ कि निचले वर्गों को दशकों से उच्च वर्गों द्वारा भेदभाव का शिकार होना पड़ा है, जिस पर सरकार को समय पर रोकना चाहिए।

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