बिहार-भारतीय मुसलमानों का अंतिम चुनावी पड़ाव ??

बिहार विधानसभा चुनाव चल रहा है और सारी सेनायें अपने अपने लड़ाकों के साथ मैदान में आ डटी हैं यह तय हो चुका है की कौन कहाँ से किससे टक्कर लेगा या कौन किसे टक्कर देगा लेकिन जो बात अभी तक की पूरी प्रक्रिया में साफ़ हुई है वह यह है कि 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से देश की दूसरी सबसे बड़ी आबादी को राजनैतिक हाशिये पर खड़ा करने की मुहिम जो चली थी उसका अंतिम पड़ाव आ चुका है ।

भारतीय मुसलमानों को पहले तो यह समझा दिया गया कि उन्हें दूर रहकर कथित सेक्युलर दलों के पक्ष में मतदान करना होगा वरना भारतीय जनता पार्टी को नहीं हरा पाएंगे क्योंकि बहुसंख्यक समुदाय का वोट अगर नहीं मिला तो जीत संभव नहीं है ,भोला भाला मुसलमान इसे स्वीकार कर किनारे खड़ा हो गया और तमाशबीन की तरह तमाशा देखने लगा जब रिंगमास्टर चाहता जाकर वोट कर आता और अंतिम परिणाम बीजेपी की जीत और कथित सेक्युलर दल की हार होता यह कैसे इसका उत्तर देने को यह नेता तैयार नहीं है ।

दूसरा काम जो बड़ी खूबसूरती से किया गया है वह है मज़हबी क़यादत से क़ौम का भरोसा तोड़ने का और यह काम भी बड़े ही सलीक़े से अंजाम दिया गया ,मज़हबी सियासत की सौदेबाज़ी को मंज़रे आम पर लाकर उन्हें पहले बदनाम किया गया और फिर किनारे लगा दिया गया ,हालाँकि क़ौम का ग़ुस्सा मज़हबी क़यादत से काफ़ी हद तक जायज़ है लेकिन वह इस साज़िश को नहीं समझ सके कि बिना किसी विकल्प को तैयार किए अगर हम इनसे दूरी का ऐलान करते हैं तो यह सीधा हमारा बड़ा नुक़सान होगा लेकिन यह हो चुका अब इस पर भी मंथन करने का समय है ।
खैर यह कोई ऐसी बात नहीं है जिससे आप वाक़िफ़ न हो लिहाजा इस किस्से पर अपने शब्दों को फ़िज़ूल बर्बाद न करते हुए और आपके मूल्यवान समय को सहेजते हुए सीधे उस बात की तरफ़ आते हैं जो अगर नहीं समझी गई तो वह समय दूर नहीं जब भारत में मुसलमानों के पास कोई अधिकार नहीं होगा वोट का भी नहीं !!

आप शायद चौके हों या फिर हर बार की तरह आपने एक ख़ुद को समझदार समझने वाली कुटिल मुस्कान चेहरे पर बिखेर ली हो और ऐलान किया हो कि सब ठीक है कुछ नहीं होने जा रहा चलिए आपकी बात मान ली जाये तो क्या आप यह बता सकते हैं कि पिछली सरकारों में कितने मुसलमान होते थे और अब कितने है ? केंद्र सरकार से लेकर राज्य सरकारों में आपकी नुमाइंदगी क्या है ?विपक्ष ने आपको कितनी हिस्सेदारी दी है ? आपके सवालों पर क्या कोई आंदोलन के लिए तैयार है ? शायद आप चाह कर भी जवाब नहीं दे सकेंगे क्योंकि यह सब एक दिन में नहीं हुआ बल्कि धीरे धीरे आपको बीच फ़ील्ड से बाउंड्री लाइन के बाहर खड़ा किया गया है और अब स्टेडियम से बाहर करने की बारी है ।
कांग्रेस की राजनीत से सब वाक़िफ़ हैं आरएसएस की ए टीम कांग्रेस किस तरह अपना खेल खेल रही है इसे समझना देश की पहली ज़िम्मेदारी है यहाँ एक बात साफ़ करना ज़रूरी है वह यह है कि राहुल गांधी की नियत पर शक नहीं किया जा सकता लेकिन जिस तरह राहुल की मेहनत पर पूरी कांग्रेस मिलकर पानी फेरती है वह यह साफ़ करता है कि कांग्रेस बीजेपी को हराने के लिए नहीं लड़ती बल्कि उसे और अधिक ताकतवर बनाने का प्रयास करती नज़र आती है मेरी इस बात को साबित करने के लिए बिहार के पूरे घटनाक्रम को क्रमवार देखना ज़रूरी है ।

जिस तरह बिहार चुनाव चढ़ रहा है और महागठबंधन का बिखराव तनातनी एक दूसरे को हराने का प्रयास लगने वाली हरकते सामने आईं और आम जनमानस में यह संदेश साफ़ होने लगा कि जीत एनडीए की हीने जा रही है अब या तो ख़ामोशी से ऐसे होने दिया जाये या फिर कुछ कोशिश को जाये इतनी प्रक्रिया बची सी लगने लगी है ,ऐसा मेरा कोई पूर्वानुमान नहीं है लेकिन चाय की रेहड़ियों से लेकर गाँव की चौपाल तक यह बाते हो रही है ।
सवाल यह भी पूछा जा रहा है कि वोट अधिकार यात्रा से जो माहौल बनाया गया था ऐसा क्या हुआ कि उसकी हवा ख़ुद कांग्रेस ही निकाल रही है ?राहुल जिस पिछड़े और अति पिछड़े की राजनीत की बात कर रहे थे उनके अधिकारो की बात कर रहे थे आख़िर कैसे टिकट बंटवारे में उसके उलट काम हुआ ?सवाल यह भी है कि जब बिहार में चुनाव चल रहे हैं तो राहुल गांधी दिल्ली में जलेबी क्यों छान रहे थे ? जिस समय रणनीतिक तौर पर बीजेपी का पूरा शीर्ष नेतृत्व बिहार में उतर चुका और हर तरह से चुनाव को अपने पक्ष में करने में जुटा है उस समय भी कांग्रेस मैदान से गायब क्यों दिखी ?यहाँ तक कि बिहार चुनाव प्रभारी कृष्ण अलवरु का फ़ोन भी बंद था और उनपर लगातार बिहार कांग्रेस को बेचने के आरोप लग रहे हैं ।

खैर यह रोना तो कांग्रेस और महागठबंधन की आपसी सिरफुटव्वल का है अब मूल विषय पर आते हैं और वह है मुसलमानों की राजनैतिक लड़ाई ! लगातार राजनैतिक आधार पर मुसलमान कमजोर हो रहे हैं एक तरफ़ उनकी मज़हबी क़यादत का जो ढोंग है उसने उनके लिए एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है और दूसरी तरफ़ सियासी यतीमी का जो सदमा है उससे उबर पाने में वह लगातार नाकामयाब हो रहे हैं और उसकी असली वजह उनका सिंबल प्रेम है जिससे उन्हें आज़ादी नहीं मिल पा रही है ।
संविधान की रक्षा करनी हो ,सांप्रदायिक ताकतों को रोकना हो ,देश के विकास का मार्ग प्रशस्त करना हो ,सांप्रदायिक सौहार्द को मज़बूत करना हो इन सभी कार्यों की पहली ज़िम्मेदारी मुसलमानों के कंधों पर है और यह अपनी ज़िम्मेदारी अपने वजूद को खो कर निभाते चले आ रहे हैं ।

कांग्रेस ने कभी ज़मीनी मुसलमान नेता को आगे नहीं बढ़ने दिया और हमेशा से मुसलमानों का नेता मनोनीत किया जिसकी चुनावी वैल्यू कभी 20000 वोट से ज़्यादा न हो यही वजह रही कि अज़ादी के बाद से मुसलमानों ने पंडित नेहरू से लेकर राजीव गांधी तक को नेता माना और उनके बाद सोनिया गांधी राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को अपना नेता मान रहे है हालांकि इसमें कोई बुराई नहीं है लेकिन सवाल यह है कि फिर इस मनोनीत चेहरे की ज़रूरत क्या ? क्या सिर्फ़ इस मुखौटे से फ़रेब देना है ? या फिर ज़मीन पर जो मुसलमान नेता मज़बूत हैं उनके पर कतरने के लिए इसे इस्तेमाल किया जाना है ?

अभी जिस तरह का घटना क्रम हुआ और जैसी खबरे आई उसमे मुसलमान नेताओ को धोका देने वालो के जो नाम लिए जा रहे हैं उनमे ऐसे मनोनीत योद्धाओं के नाम आ रहे हैं ।
सिर्फ कांग्रेस ही नहीं राष्ट्रीय जनता दल अभी भी यह बताने में व्यस्त है कि हम मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीत नहीं करते इसलिए एक ग़ैर संवैधानिक हैसियत वाले उप मुख्यमंत्री जैसे पद की घोषणा में भी मुसलमान नाम नहीं आने दिया और फ़ज़ीहत होने पर दबी ज़ुबान में कहा कि और भी लोग होंगे जो चुनाव के बाद बताया जाएगा ! अरे ऐसा क्या डर है ?
अगर लोग मुसलमान नाम से इतनी नफ़रत कर रहे हैं और आपका कोर मतदाता भी मुसलमान नाम से आपको वोट नहीं देगा तो मुसलमान आपको वोट क्यो दे ?आरजेडी का कोर मतदाता मुसलमान और यादव है बाकी उसे छुटपुट वोट मिलता है तो आख़िर वह कैन लोग हैं जो मुसलमान के नाम से आपको वोट नहीं देंगे क्या यादव ?हालांकि यह साफ़ देखा भी गया है जहाँ प्रत्याशी मुसलमान है वहाँ यादव समाज तेजस्वी को मुख्यमंत्री नहीं बना रहा है पिछले चुनाव परिणामों में यह बात साबित भी हुई है तो मुसलमान आख़िर आपके प्रत्याशियों के पक्ष में क्यों खड़े हो ?
अब यहाँ कुछ बीजेपी हराओ मुहिम के अलंबरदार आ कर कहेंगे इस वक्त इन बातो की कोई ज़रूरत नहीं है हमे बीजेपी को हराना है उस पर फोकस करना है बाक़ी कुछ नहीं हम अपनी लड़ाई बाद में देख लेंगे तो उनसे सवाल है बीजेपी को किसके लिए हराना है अगर संघ को ही जीत दिलानी है तो भाजपा को जीतने दे उसके छद्म रूप को क्यो ? हालांकि यह बहस लंबी है और इसका अंत अभी नहीं ।

तेजस्वी यादव ने अपने आपको मुसलमानों का मसीहा साबित करने की पूरी कोशिश करते हुए ख़ुद सेल्फ गोल भी मार लिया और बैरिस्टर असदुद्दीन ओवैसी को एक्स्ट्रीमिस्ट यानी अतिवादी या आतंकवादी कह दिया और उसकी वजह उनकी वेशभूषा और विचार बता दिया अब सवाल यह है क्या उस वेशभूषा वाला व्यक्ति वैसे विचार व्यक्त करने वाला व्यक्ति तेजस्वी की नज़र में आतंकवादी है ? अगर हाँ तो सभी मुसलमानों को उस वेशभूषा और विचार पर गर्व है और तेजस्वी उन्हें आतंकवादी मानते हैं ?
मतलब यह कि जो लोग मुसलमानों के ख़िलाफ़ हैं और तेजस्वी और कांग्रेस को वोट नहीं देना चाहते हैं उन्हें लुभाने के लिए भी गाली मुसलमान खायें और इन्हें वोट भी करें यह हमारी दुर्दशा है ।और इस दुर्दशा के ज़िम्मेदार भी हम हैं ।
खैर रोना कब तक रोया जाये सीधे मसले पर बात करी जाए कि अब क्या करें हम ? तो सबसे पहले पार्टी नहीं उंम्मीदवार चुनिए जो उम्मीदवार अच्छा हो उसे वोट दीजिए उसके दल को नहीं ।किसी को ए टीम बी टीम का सर्टिफिकेट मत दीजिए और जहाँ से आपका प्रतिनिधि जीतने की पोजीशन में है उसे वोट कर जिता दीजिए उसका दल मत देखिए जैसा दूसरे लोग आपके साथ कर रहे हैं याद रखिए राजनीत दिल से नहीं दिमाग़ से होती है और दिमाग़ का इस्तेमाल करने पर आप वोट बैंक जैसी गाली को हरा देंगे और यह सारी राजनैतिक पार्टियां ख़ुद आपकी शर्तों को मानने पर मजबूर होंगी ।
अपनी सियासी क़यादत को मज़बूत करने का सीधा तरीक़ा है किसी और के कहने से ए टीम और बी टीम कहना बंद करे वोट दीजिए या न दीजिए लेकिन इस जुमले को दोहराना बंद करना होगा और इस मामले में मान्यवर कांशीराम की बात और उनकी क़ौम के जज़्बे को समझना होगा, उन्होंने साफ़ कहा कि हमे जीत हार नहीं देखनी हमे हर विधानसभा में अपने वोट दिखाने है और उनकी क़ौम ने बात मान ली और हालात यह हुए कि बीएसपी ने सरकार बनाई बस उस फार्मूले पर अमल कर ही भारतीय मुसलमान अपनी सियासी वैतरणी को पार कर सकता है अन्यथा इस सैलाब में उसका डूबना तय है ।
ज़रूरी नहीं कि अच्छा उम्मीदवार मुसलमान ही हो जो आपको बेहतर लगे उसे वोट करें उसका दल नहीं देखें क्योंकि दलों की राजनीत आपको दलदल में धसाने की है ।
निर्दलीय उम्मीदवार को भी अगर जीतने की कंडीशन में है तो एकजुट होकर चुनाव में मदद कीजिए उसे वोट दीजिए इससे जहां सिंबल का नशा उतरेगा वही धनबल का चुनावों में प्रभाव कम होगा और अच्छे लोग राजनीत में आकर इस गंदगी को साफ़ करने की हिम्मत कर पायेंगे और इन सियासी ठेकेदारों का भरम भी टूटेगा ।
किसी दल से मुसलमान को टिकट न मिलने का रोना न रोयें जहाँ वह जीत सकने की ताक़त रखते हैं वहाँ अपने उम्मीदवार को जीत के लिए समर्थन करना चाहिए और जैसे को तैसा वाली नीति पर काम करते हुए दूसरी जगहों पर भी वैसे ही वोट करना चाहिए ।
अब सवाल होगा इससे बीजेपी को ताक़त मिलेगी तो जवाब यह है कि वह कमज़ोर कब है आपका डर जब तक इन कथित सेक्युलर दलों में मौजूद है जब तक यह खुल कर आपका नाम लेने से घबरा रहे हैं तबतक वह मज़बूत ही है क्योंकि उन्हें पता है कि इनकी नियत साफ़ नहीं है तो फिर किसी डरे हुए को हिमायत देने से बेहतर है अपने बचाव की रणनीत पर काम किया जाए अगर बिहार से यह संदेश सही से जाता है तो बंगाल और उत्तरप्रदेश में इसके बेहतर परिणाम आप देखेंगे और कांग्रेस में बैठे संघ के एजेंट संघ के लोगों को कांग्रेस का टिकट नहीं दे पायेगे ।
यह कुछ सुझाव है जिस पर अगर चाहे तो आप गौर कर सकते हैं वरना रोज़ की नई ख़बर सुनिए आपस में चर्चा कीजिए और गिनती वाले दिन नई सरकार बनने पर दुख का कहवा पी कर सो जाइये ।












